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चेक बाउंस (धारा 138 एन.आई. एक्ट): कानूनी प्रक्रिया, लीगल नोटिस और समय सीमा

Published on 2025-01-20
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6 min estimated read
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By एडवोकेट अनिल कुमार गुप्ता का चैंबर
नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 138 के तहत चेक अनादर होने पर कानूनी अधिकार, 30 दिन की लीगल नोटिस की अनिवार्यता और कोर्ट में शिकायत दर्ज करने की संपूर्ण प्रक्रिया।

धारा 138 क्या है और यह कब लागू होती है?

जब कोई व्यक्ति किसी कानूनी रूप से देय ऋण (कर्ज) या दायित्व के भुगतान के लिए चेक जारी करता है, और वह चेक बैंक खाते में पर्याप्त राशि न होने अथवा हस्ताक्षर में भिन्नता के कारण बाउंस (अनादृत) हो जाता है, तो यह नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट (NI Act), 1881 की धारा 138 के तहत एक दंडनीय अपराध बनता है।

यह कानून व्यापारिक लेन-देन में विश्वास और पारदर्शिता बनाए रखने के लिए बनाया गया है। इसमें दोषी पाए जाने पर 2 वर्ष तक का कारावास अथवा चेक राशि का दोगुना तक जुर्माना या दोनों हो सकते हैं।

चेक बाउंस होने पर अनिवार्य 5 कानूनी शर्तें

1. कानूनी रूप से वैध ऋण: चेक किसी वास्तविक लेन-देन अथवा कर्ज के भुगतान के लिए दिया गया हो। बिना किसी प्रतिफल के दिए गए चेक पर धारा 138 लागू नहीं होती।

2. 3 माह की वैधता के भीतर बैंक में प्रस्तुति: चेक जारी होने की तारीख से 3 महीने के भीतर बैंक में प्रस्तुत किया जाना चाहिए।

3. बैंक का रिटर्न मेमो: बैंक द्वारा चेक अनादृत होने का लिखित मेमो (कारण सहित) जारी किया गया हो।

4. 30 दिन के भीतर लीगल डिमांड नोटिस: बैंक से चेक बाउंस मेमो प्राप्त होने की तारीख से 30 दिनों के भीतर चेक जारीकर्ता को रजिस्टर्ड डाक या स्पीड पोस्ट द्वारा वैधानिक लीगल नोटिस भेजना अनिवार्य है।

5. 15 दिनों का भुगतान समय: नोटिस प्राप्त होने के बाद देनदार को 15 दिन के भीतर भुगतान करने का अवसर मिलता है। यदि वह 15 दिनों में भुगतान नहीं करता, तो 16वें दिन अपराध घटित माना जाता है।

अदालत में परिवाद (Complaint) दर्ज करने की समय सीमा

15 दिन की नोटिस अवधि समाप्त होने के बाद, पीड़ित पक्ष (चेक धारक) के पास संबंधित मजिस्ट्रेट न्यायालय में आपराधिक परिवाद दायर करने के लिए ठीक 30 दिन का समय होता है।

यदि इस 30 दिन की सीमा के भीतर कोर्ट में केस दर्ज नहीं कराया गया, तो देरी के लिए उचित कारण सिद्ध किए बिना कोर्ट शिकायत पर संज्ञान नहीं ले सकती। इसलिए समय सीमा का पालन अत्यंत महत्वपूर्ण है।

Statutory References & Acts

  • परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 (धारा 138 से 148)
  • धारा 143A (अंतरिम मुआवजा)
  • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता / दंड प्रक्रिया संहिता

Frequently Asked Questions

क्या चेक बाउंस केस में आपसी समझौता संभव है?

हाँ, धारा 147 के अंतर्गत चेक बाउंस का अपराध शमनीय (Compoundable) है। दोनों पक्ष अदालत या लोक अदालत के माध्यम से किसी भी स्तर पर आपसी सहमति से समझौता कर सकते हैं।

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Important Disclaimer: This article is published for educational purposes only and reflects general statutory principles under Indian law. It should not be treated as a legal opinion or formal legal advice. Individual cases depend heavily on specific documentary evidence and dates of cause of action.

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